Description
यह ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय- ‘कर्मसंन्यासयोग’ का गहन, सूक्ष्म और साधना-प्रधान विवेचन प्रस्तुत करता है। यहाँ पंचम अध्याय को केवल एक पृथक अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ अध्यायों में विकसित ज्ञान-कर्म-समन्वय की स्वाभाविक परिणति के रूप में देखा गया है। इस दृष्टि से कर्मसंन्यास बाह्य त्याग नहीं, बल्कि अन्तःकरण की शुद्धि और कर्तृत्व बोध के विसर्जन की प्रक्रिया के रूप में उद्घाटित होता है।
यह कृति वाराणसी में सन् 1977-1979 के मध्य दिए गए पद्मश्री डॉ. वागीश शास्त्री के सुप्रसिद्ध प्रवचनों पर आधारित है। इन प्रवचनों का पुनर्सयोजन शास्त्रीय परम्परा, योगदृष्टि और जीवनानुभव-तीनों को एक साथ प्रस्तुत करता है। प्रत्येक श्लोक का विवेचन व्याकरणिक स्पष्टता, दार्शनिक गहनता और साधना-उपयोगिता के संतुलन के साथ किया गया है, जिससे पाठक के लिए गीता का तत्त्व केवल बौद्धिक विषय नहीं, बल्कि अनुभव का विषय बन जाता है।





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