Description
प्रस्तुत पुस्तक में संस्कृति के विविध पक्षों यथा धर्म, दर्शन, काव्य, कला, समाज आदि का निरूपण किया गया है। पाश्चात्य संस्कृति के आलोक में की गयी भारतीय संस्कृति की आलोचना की आधारहीनता को प्रस्तुत करने के साथ ही भारतीय संस्कृति के लक्ष्य को भी इस ग्रंथ में प्रतिपादित किया गया है। भारतीय संस्कृति में मनुष्य की सान्त चेतना के अधिकाधिक विकास पर बल दिया गया है। इस संस्कृति में जीवन को ही सर्वस्व मानकर विचार प्रस्तुत नहीं किया गया है अपितु इस जीवन से परे भी देखने की चेष्टा की गयी है। इस प्रकार इस संस्कृति में सनातन और सांसारिक का अद्भुत समन्वय है। साथ ही यह ग्रंथ श्री अरविन्द दर्शन के सर्वथा अनालोचित पक्ष का उद्घाटन करता है।





Reviews
There are no reviews yet.