Description
यह पुस्तक समयसार के गूढ़ सिद्धांतों को सरल संवाद शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास है। पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी को समयसार की प्राप्ति के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में, लेखक ने इसे अपने विद्यार्थियों के आग्रह पर तैयार किया है।
समयसार, आचार्य कुंदकुंद द्वारा विरचित, संपूर्ण दार्शनिक जगत में अध्यात्म का सर्वोत्तम ग्रंथ माना जाता है। यह ग्रंथ जन-जन को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करता है। यद्यपि समयसार की संस्कृत टीकाएँ उपलब्ध हैं और हिंदी में भी इसकी व्याख्या लिखी गई है, फिर भी इसकी गहराई को सहजता से समझना साधकों के लिए एक चुनौती बना रहता है।
आचार्य अमृतचंद्र कृत आत्मख्याति टीका और आचार्य जयसेन कृत तात्पर्यवृत्ति टीका के अतिरिक्त समयसार पर अनेक महत्वपूर्ण व्याख्याएँ लिखी गई हैं। इसके आधार पर पं. बनारसीदास जी ने भी नाटक समयसार की रचना की है। इन सब कारणों से यह ग्रंथ प्रत्येक मुमुक्षु (मोक्ष की आकांक्षा रखने वाले साधक) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आधुनिक युग में, 20वीं शताब्दी में पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के प्रताप से यह ग्रंथ अत्यंत लोकप्रिय हो गया। प्रत्येक मुमुक्षु को अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार इस ग्रंथ का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। इसी उद्देश्य से इस ग्रंथ को अत्यंत सरल संवाद शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। संवाद शैली, जिसे यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने विकसित किया था, विषय को रोचक, प्रवाहपूर्ण और सहज बनाती है, जिससे पाठकों को विषय को समझने में सुविधा हो।





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